घबराहट में सुधबुध खो बैठा था अफजल

लोकतंत्र के मंदिर को दहलाने की साजिश रचने वाला जैश ए मोहम्मद का आतंकी अफजल गुरू को सामने जब अपनी मौत नजर आई तो घबराहट में वह अपनी सुधबुध खो बैठा था। तिहाड़ जेल सूत्रों के अनुसार ब्लैक वारंट सुनकर वह इतना सहम गया था कि कुछ पल के लिए तो कुछ सोच ही नहीं पा रहा था। ऐसा लगा जैसे उसने कुछ सुना या समझा ही नहीं। इस बात पर वह यकीन नहीं कर पा रहा था कि जिस जेल में उसने 12 साल बिताए वमहफूज रहा, वहां एकाएक ऐसा क्या हो गया कि उसकी मौत आकरदस्तक दे रही है। अफजल की फांसी की प्रक्रिया में शामिल एक वरिष्ठ अधिकारी की माने तो वह इतना घबरा गया था कि पत्‍‌नी व बच्चे से मिलने की इच्छा भी जाहिर नहीं कर पाया। उसका चेहरा देखकर लग रहा था कि वहअंदर से काफी टूट गया था। अफजल को तिहाड़ जेल-3 के हाई सिक्यूरिटी वार्ड में रखा गया था। जहां तमिलनाडु पुलिस के जवान 24 घंटे तैनातरहते थे। जेल सूत्रों के अनुसार मध्यम लंबाई का औसत काया वाला अफजल भले ही ज्यादा लंबा नहीं था। पर उसकी आवाज काफी बुलंद थी। वहजेल में किसी से ज्यादा बातचीत नहीं करता था। यदि अधिकारी बात करते तो वह संसदपर हुए हमले के बारे में भी बात करता था। तिहाड़ जेल-3 केएक पूर्व जेल अधीक्षक को उसने पूरी कहानी बताई है, जिसमें उसने अपना गुनाह कबूल किया है। साथ ही उसने खुद को आतंकियों का एक मोहराबताया है। एक अधिकारी ने बताया कि जेल में फांसी देनेके लिए चल रही तैयारियों के कारण वैसे तो उसे पहले भनक लग गई थी। फिर भी उसे विश्वास था कि उसे राजनीतिक कारणों से उसे फांसी नहीं दीजाएगी। इस बात को लेकर हमेशावह संतोष की मुद्रा में रहताथा। चेहरे लाल हो गया था- जेल सूत्रों के अनुसार फांसी के विषय में सुनते ही अफजल का चेहरा चेहरा लाल हो गया। उसके मुंह से शब्द नहींनिकल पा रहे थे। उससे आखिरी इच्छा पूछी गई तो घबराहट मेंउसके मुंह से सिर्फ कुरान शब्द निकला। जबकि कुरान उसके पास पहले से ही थी।

4 comments:

Ramakant Singh said...

मौत का खौफ ही ऐसा है चाहे व्यक्ति किसी भी जाती धर्म का कितना भी कट्टर पंथी क्यों न हो

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

म्रत्यु के आख़िरी समय सबको सिर्फ भगवान(खुदा) याद रहते है

RECENT POST... नवगीत,

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

म्रत्यु के आख़िरी समय सबको सिर्फ भगवान(खुदा) याद रहते है

RECENT POST... नवगीत,

Virendra Kumar Sharma said...

बढ़िया भाव झलकियाँ एक आतंकी की .शुक्रिया आपकी टिपण्णी का .पुराने हस्ताक्षर जब ब्लॉग पे लौट के आते हैं और भी अच्छा लगता है .

नकली दहशद गर्द निकला अफज़ल गूर (गूर बोले तो ग्वाला कश्मीर की एक जाति अंग्रेजी अखबारों ने इसे गुरु बना दिया )